Monday, January 5, 2009

नया खजाना

क्यूँ तेरी खामोशी मुझे खामोश कर जाती है, क्यूँ तेरी उदासी मुझे उदास कर जाती है
क्या रिश्ता है मेरा और तेरा, जो हर पल तेरी याद मुझे, तनहा कर जाती है

नही कुछ भी मोहब्बत के सिवा अब याद आता है,
तुम्हारी जुस्तु ने अब किसी लायक नही छोड़ा


ऐ खुदा ख्वाहिशों के दरबार में हो मोहब्बत की इतनी इन्तहा
की मेरी हर साँस पर महबूब के नाम की दस्तक हो

मुद्दतों बाद देखा उन्हें, होश कैसे ठिकाने लगे,
अश्क पलकों पर आए मेरी और लैब थार थराने लगे
जिनको मुश्किल से भूले the हम, फ़िर वही याद आने लगे

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